Monday, March 11, 2013


                                     आशा 

आशा  नाम तो यही खा था माँ ने , बापू  ने बताया था  , बापू अभी पीकर आयेगा , उसे देर तक दुलारेगा और देर रात तक रोते-रोते  सो जायेगा | युवा होती आशा का जीवन था तो नैराश्य के दल-दल में परन्तु एक आशा उसे लगी रहती, कि कोई दिन बापू दारू छोड़कर उसके लिए एक दुल्हे को लायेंगे | और यदि वह दुल्हा दारु पीकर आयेगा, तो मोगरी से उसकी पिटाई करूंगी , यह सोचते-सोचते उसे खुद पर हंसी भी गयी | कि मोबाईल की घंटी से विचारों की तंद्रा टूटी | बंगले वाली बाई साहब का फोन था , उन्होंने दिलाया था ताकि जब भी जरुरत हो, उसे बुलाया जा सके | हेलो, कडक आवाज़ में फोन से आवाज आयी सुबह जल्दी जाना | मन तो हुआ कह दे कि बचपन से आज तक रोज तो सुबह जल्दी आती हूँ फिर भी ….जी कहकर फोन काट दिया | बापू आयेगा और खाना तो तैयार नहीं है ..बनायेंगे क्या घर में थोड़ा सा आटा है , दाल जो बंगले वाली बाई साहब ने काम से आते वक्त शाम को दे दी थी यह कहकर कि कल रात तेरे भैय्या जी के लिए बनाई थी, खराब हो गयी हो तो बाहर गाय को खिला देना | भैयाजी यह रिश्ता बाई साहब ने किसी अनजान डर से बाँध दिया था | उसने बाहर आकर दाल को सुंघा फिर , खटाई की महक दाल से आ रही थी पर वह उसे रात में खाने के लिए घर ले आयी थी | उसने जल्दी से आटा गूँथा पर रोटियाँ केवल तीन ही बन पायी , बापू कहता है तेरी रोटी एकदम पूनम के चाँद जैसी लगती है इतनी गोल तो तेरी माँ से भी न बनती थी | इतनी तारीफ़ से उसकी दिन भर की थकान उतर जाती थी उसे लगता जैसे कोई सोने का तमगा उसे मिल गया हो जैसे किसी खिलाड़ी को मिलता है | माँ, सात वर्ष की उम्र में ही उसे बड़ी बनाकर इस दुनिया से विदा हो ली | जब माँ गयी थी तब उसे याद है, माँ को लेटाकर बापू ने उसे नई साड़ी ओढाई थी , जिन्दगी भर चिथड़ो में रहने वाली रानी नई साड़ी पहने , आशा को अपनी गरीबी का साम्राज्य सौप कर हमेशा के लिए जा रही थी | बड़ी देर हो गयी , अब तक तो बापू रोज आ जाता था , आज क्यों नहीं आया ..कही उस दिन जैसा पीकर ..कलाली में तो नही सो गया ! कोई बड़ी भारी बस ने उसे टक्कर तो नही मार दी ! आशंकाओं से आशा का मन भर गया था कि दरवाजे की कुंडी खटकने से उसकी जान में जान आयी पर वह कुंडी पास की लक्ष्मी काकी ने खटकाई थी .. क्या हुआ काकी ? क्या होगा.. तेरे काका अब तक घर नही आये सोचा तेरे बापू के साथ हो ..पर काकी बापू भी अभी तक घर नही आया, क्या हुआ होगा? इतनी रात हो गयी , मुझे डर लग रहा है | एक लक्ष्मी काकी ही है, जिसे वह सब बता पाती है | अबकी बार कभी न घबराने वाली लक्ष्मी काकी भी घबरा रही थी | कही दोनों दोस्त वही तो नहीं चले गए जिसका डर उसे सता रहा था पर वह आशा को और परेशान नही करना चाहती थी पर उसका डर निराधार नही था | आखिर रात एक बजे दोनों दोस्त झूमते हुए आ गए | बापू जैसे तैसे खाट पर बैठा, आशा ने एक थाली में रोटी और दाल रखकर बापू को दी, दाल की गंध से बापू बैचेन हो गया उसने केवल रोटियाँ ही नमक से खा ली .. खाते-खाते पूनम का चाँद बताना न भुला पर आज आशा को भी अजीब सी भूख सता रही थी उसने सुबह भी नही खाया था | सोचा दाल ही पी लू ,हालाँकि दाल की गंध नाक को अच्छी तो नही लग रही थी पर भूखे रहने से कुछ खा लेना बेहतर यह सोचकर उसने दाल पी ली और ऊपर से ढेर सारा पानी पी लिया. ऐसा वह पहले भी कर चुकी है | बाहर जोर-जोर से गालियों की आवाज़े आ रही थी , रोज ऐसा होता है , बस्ती में औरते मर्दों से पिटती रहती है कोई नई बात तो है नहीं | एक सवाल आशा के मन मस्तिष्क को हमेशा से सताता रहता है कि आखिर औरतों को सताते क्यों है ? उसके बाल-मन पर आज भी उन थप्पड़ों की गूंज है जो बापू उसकी माँ को मारा करता था | माँ थी , तब भी गरीबी थी, पर उस गरीबी में अमीरों के आनंद से अधिक आनंद था | गीली मिट्टी और पानी के बने खिलौने सभी बच्चों को अच्छे लगते है , आशा को भी अच्छे लगते थे | सोचते-सोचते उसकी नम आँखों के आँसू गालों पर आकर ठहर गए | कब नींद लगी, कुछ खबर नहीं ...अलबत्ता ..सुबह जल्दी उठना ..जरूरी था ..अचानक आशा को उसके गालों पर सिहरन सी महसूस हुई , वह डरकर जागी | उसका बापू उसके गालो को सहला रहा था | पहले ऐसा कभी नही हुआ था अक्सर वह बापू के जागने से पहले ही जाग जाती थी | प्रेम के स्पर्श से वंचित उसके गालो को यह छुअन उसे वैसी ही लगी जब एक दिन भैयाजी ने उसके गालों को बाई साहब की गैर-हाजिरी में छुआ था | भैय्याजी का उसकी तरफ प्यार से मुस्कुरा के देखना, उसे कतई नहीं भाता था. वह जल्दी से तैयार होकर बंगले वाली बाई साहब के यहाँ जाने के लिए निकलती है ....पेट में उठ रही  मरोड़ से चलना दूभर हो रहा था फिर भी बाई साहब की डांट सुनने से दर्द सहना उसे अच्छा लगा | वह बंगले पर पहुँची | हालाँकि भैय्याजी की मुस्कराहट से तो बाई साहब का गुर्राना ठीक , कुछ हद तक उसमे अधिकार और सुरक्षा की भावना तो थी | नारी मन प्राय: नारियल के समान होता है , बाई साहब का गुस्सा होता तो वास्तविक था परन्तु उनके मन में आशा के लिए एक छोटा सा करुणा से भरा कोना भी था | बाई साहब के बंगले पर उसे लक्ष्मी काकी ने ही काम पर लगवाया था | सात वर्ष की उम्र से वह बंगले पर आ रही है | सात साल कब बीत गए खुद उसे भी पता नही चला , समय तो पंख लगाकर उड़ है आशा बचपन की दहलीज को लाँघ किशोरी में बदल गयी थी | सांवला रंग, करीने से सजे बाल, तीखे नाक-नक्श और उसके कपडे पहनने का सलीका, यह सब उसके सौन्दर्य में वृद्धी करता था|  पहले कभी उसने यह महसूस नही किया था, पर कुछ महीनों से वह पुरुष दृष्टी में स्पष्ट बदलाव पा रही थी | आज जब बाई साहब उसे घर का काम समझा कर मंदिर जाने को निकली तो अन्जाने डर से उसका दिल धड़कने लगा क्योकि जब भी बाई साहब घर में ना होती , भैयाजी उसके पास आने का मौक़ा कोई मौक़ा नही छोड़ते | वह यह बाते बाई साहब को भी बता नही पाती थी , उसकी बातों पर विश्वास हो तो भी नौकरानी को ही घर से निकाला जाएगा , गृह स्वामी का क्या बिगड़ना | बाई साहब जाते-जाते कहकर गयी थी  कि “ तेरे भैय्याजी को चाय बना देना और बगीचे में दे आना, वे पौधों को पानी दे रहे है “ | बड़ी मुश्किल से आशा के मुँह से जी निकला | बाई साहब जाते-जाते भैयाजी को कह गयी कि चाय पी लेना आशा बना रही है, मै घंटे भर में लौटती हूँ | जैसे ही बाई साहब रिक्शा में बैठी , भैयाजी , पौधों को पानी देना  छोड़ कर सीधे घर में घुसे और जोर से आवाज लगाकर आशा को चाय लाने को बोला | पेटदर्द से परेशान आशा जैसे ही चाय लेकर भैयाजी को देने गयी , चाय का कप टेबल पर रखकर आशा को प्यार से बोले “ कितना काम करती हो बैठो, आराम से “ वह नहीं कहकर जाने को मुडी पर जैसे आज भैय्याजी कोई मौक़ा नही छोड़ना चाहते थे | उन्होंने बल-जबरी से आशा को बाहोँ में भरकर चूमना चाहा कि अचानक आशा वितृष्णा से भर उठी , भैय्याजी अपने प्रयत्नों में सफल हो पाते तभी आशा के पेट में जोर से मरोड़ उठी और वह भैय्याजी के ऊपर उल्टी कर बैठी, भैयाजी की सारी वासना काफूर हो चुकी थी,,छी,छी कहते हुए उन्होंने अपने कदम पीछे खींचे और आशा पूरी ताकत लगाकर अपने घर की तरफ भागी | इस समय वह अपना पेट दर्द भी भूल चुकी थी |  वह सीधे लक्ष्मी काकी से मिलना चाहती थी पर इस समय तो वह भी काम पर चली गयी थी | वह निढाल होकर उसकी खोली तक आई, अब उसमे इतनी भी शक्ती शेष ना बची कि वह दरवाजे की कुंडी खोल सके | बेहोश होकर वह बाहर ही गिर पडी, होश आया तो खुद को सरकारी अस्पताल के बरामदे में जमीन पर पाया | लक्ष्मी काकी उसके होश में आने का ही इन्तजार कर रही थी, उसे तो तब पता चला जब वह दोपहर में घर आई थी वरना क्या मालुम ? कब तक वह ऐसी हालत में वही पडी रहती | अब आशा का सब्र छलकने लगा , काकी के आँचल में मुँह छिपा कर आँसुओं  ने वह सब बयान कर दिया , जो , शब्द कभी नहीं कह पाते | लक्ष्मी काकी ने निश्चय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो , अब आशा बंगले पर काम नहीं करेगी, उसने बाई साहब का मोबाईल फ़ोन भी उन्हें वापस करने की ठानी  पर वह तो हडबडाहट में आशा बंगले पर ही छोड़ आयी थी और भैय्याजी, उन्होंने सबूत मिटाने के लिए उसे अपने कब्जे में ले लिया था |
घर शाम को आने के बाद लक्ष्मी काकी ही उसके लिए मुँग की खिचडी बना कर लाई थी पर आशा को खुद से ज्यादा उसके बापू की फ़िक्र थी पर वह शराबी और स्वार्थी पिता इन मासूम जज्बातों को क्या जाने ? लक्ष्मी काकी ताड़ गयी , बोली “ फ़िक्र मत कर तेरे काका के लिए तो बनाउंगी ही , तेरे बापू के लिए भी बना दूंगी | यह सुनने के बाद ही खिचडी उसके हलक से नीचे उतरी |
आज नींद आशा से रूठी हुई थी | अब तो उसे उसके बापू के आने का भी इन्तजार नही रहा | कुछ दिनों से वह बापू के स्वभाव में एक बदलाव सा पा रही थी पर इस बदलाव का कारण उसे समझ नहीं आ रहा था | देर रात जब बापू घर आया, तो , उसके आने से पहले ही आशा की नाक को उसके आने की गंध मिल गयी थी | बापू कुछ बडबडा रहा था “ घर का कुम्हार फूटी हांडी में खाए , बाहर का आकर चट कर जाए ...नही ..ऐसा नही..” , आशा की आँखों में आँसू थे और उसके बापू की आँखों में भूख , वह आशा के आँखों से आँसू पोछते-पोछते उसे बेहताशा चूमने लगा , आशा कुछ समझ पाती इसके पहले एक पिता पितृत्व की भावना को छोड़ पशु बन बैठा |